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विजयादशमी – बुराई पर अच्छाई की जीत!

नवरात्रि का उल्लास दशहरा के भव्य त्योहार के लिए रास्ता तय कर रहा है !! पूरे भारत एवं बांग्लादेश के कुछ हिस्सों में दशहरा बहुत धूमधाम और खुशी के साथ मनाया जाता है। यह बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है, और लोगों में उसी विश्वास को बरकरार रखता है। भारत के कुछ हिस्सों में, दशहरा को विजयादशमी भी कहा जाता है। चलिये और देखिये ये शब्द क्यों और कैसे शब्द बनाया गया।

दशहरा उस दिन को चिह्नित करता है जब भगवान राम ने रावण को पराजित किया, जो वर्तमान श्री लंका का एक दुष्ट राजा था। उस बुरे दानव की पकड़ से अपनी पत्नी को बचाने के लिए भगवान राम ने युद्ध किया और सफलतापूर्वक रावण से जीता। इस अद्वितीय विजय की खबर सुनते ही, अयोध्या के लोग उत्साही हो गए। भगवान राम का स्वागत करने की तैयारी में, उन्होंने मिट्टी के दीपकों को सारा अयोध्या सुसज्जित करना शुरू कर दिया। (एक परंपरा जो दिवाली के त्यौहार के रूप में मनाई जाएगी)।

दशहरा भी उस दिन को संकेतित करता है जब देवी दुर्गा ने दुष्ट राक्षस महिषासुर का संहार कर अनंतकाल के लिए एक अंधेरे युग को दूर किया। यह घटना महीने के दसवें दिन (दशमी) को हुई थी। निराशा के खिलाफ आशा की विजय (जीत) को चिह्नित करने के लिए, दशहरा को विजयादशमी भी कहा जाता है।

एक तीसरी किंवदंती बताती है कि कैसे पौराणिक पांडव राजकुमारों ने दशहरा के दिन सफलतापूर्वक 12 साल का निर्वासन पूर्ण किया। पांडव राजकुमारों ने अपने आने वाले अज्ञातवास आरंभ होने से पहले एक शमी पेड़ की जड़ों में अपने हथियार दफन कर दिए। पांडवों के सम्मान में, लोग दशहरा के दिन शमी के पेड़ की पत्तियों का आदान-प्रदान करते हैं। कुछ समुदायों के लोग कठमूली (अपटा) पेड़ की पत्तियों का आदान-प्रदान करते हैं जो शमी के पेड़ से अलग हैं।

पूरे भारत में विभिन्न तरीकों से दशहरा मनाया जाता है जहां प्रत्येक उत्सव दूसरे की तुलना में अधिक शानदार होता है !!! ग्रेगोरियन कैलेंडर के अनुसार, यह सितंबर या अक्टूबर में मनाया जाता है।

दशहरा हिंदुओं में अनन्यसाधारण महत्त्व रखता है क्योंकि यह हिन्दू मान्यता के अनुसार सबसे पवित्र महीने में मनाया जाता है। नए कपड़े, आभूषण आदि पहंकर इस त्योहार में मानो चार चाँद लग जाते हैं।

जीवन में कुछ ऐसे अनुभव हैं जो अविस्मरणीय होते हैं। दशहरा के आसपास के आनंद एवं उत्सव के वातावरण का हिस्सा होना ऐसा ही एक अनूठा अनुभव है।
अब अपनी अगली छुट्टी की योजना दशहरा के समय के साथ मेल खाती हुई बनाएं और पूरे भारत में इन शानदार समारोहों का हिस्सा बनें !! यह आलेख पाठकों को दशहरा के आस-पास भव्यता और उत्साह की एक झलक प्रदान करता है।

दशहरा कहाँ मनाया जाता है?

पूरे भारत में बड़े हर्षोल्लास के साथ दशहरा मनाया जाता है। हालांकि उत्सव हर जगह समान नहीं होते हैं, परंतु उसके विभिन्न रूपों का समान रूप आनंद लिया जाता है।
आइए और जाने भारत के कुछ स्थानों के बारे में जो कि अपने दशहरा समारोहों के लिए दूसरों की तुलना में अधिक प्रसिद्ध हैं:
सहूलियत के लिए हम क्षेत्रानुसार आगे बढ़ेंगे:

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1. उत्तर:
हिमाचल प्रदेश, पंजाब, उत्तर प्रदेश राज्यों के रहिवासी (उत्तर भारतीय) हर साल बड़े धूमधाम और खुशी के साथ दशहरा का उत्सव मनाते हैं। उत्तर भारत के कुछ प्रमुख स्थल यहां दिए गए हैं, जो उनके अद्वितीय दशहरा समारोहों के लिए जाने जाते हैं।

  • कुल्लू: कुल्लू का अनोखा शहर हिमाचल प्रदेश में ब्यास नदी के खूबसूरत तट पर स्थित है। कुल्लू में दशहरा के इस भव्य समारोह ने 1 9 72 में एक अंतरराष्ट्रीय त्यौहार की पदवी प्राप्त की।
    ‘कुल्लू दशहरा’ को बड़े स्तर पर मनाया जाता है जिसकी भव्यता का अनुभव करने दूर-दूर से अंतर्राष्ट्रीय पर्यटक भी आते हैं। आश्चर्यजनक बात तो यह है कि कुल्लू दशहरा केवल एक दिवस नहीं बल्कि एक उत्सव की तरह एक सप्ताह या उससे अधिक समय तक मनाया जाता है!! 100,000 से अधिक लोग हर साल कुल्लू में दशहरा समारोह में आते हैं!
  • अयोध्या: उत्तर प्रदेश राज्य का यह छोटा सा शहर अयोध्या भगवान राम का जन्म स्थान माना जाता है। इसलिए, यहां रहने वाले लोग दशहरा के पर्व के साथ एक विशेष संबंध महसूस करते हैं। लोग सुंदर परिधान एवं आभूषण से सुसज्जित होकर भगवान राम के मंदिरों का दर्शन करते हैं और इस शुभ दिन पर उपहार और आशीर्वाद का आदान-प्रदान करते हैं।

उत्तर प्रदेश के अन्य कस्बों और गांव में भी दशहरा मनाने की खुशी सांसर्गिक रूप से फैलती जाती है। भगवान राम की किंवदंती के कारण इस शहर का खास धार्मिक महत्व है। तीर्थ यात्रा पर जाने वाले पर्यटकों के लिए यह एक मुख्य पर्यटन स्थल बन चुका है।

पूरे भारत में दशहरा को अनोखे सौन्दर्य से मनाया जाता है। परंतु उपर्युक्त स्थानों में आयोजित समारोहों का एक अनूठा ही आकर्षण है। उत्तर भारत के इन स्थानों के अलावा, दशहरा जम्मू-कश्मीर और दिल्ली राज्यों में भी मनाया जाता है। ‘शोभा यात्रा’ जिसका अर्थ ‘एक सुंदर जुलूस’ है, कश्मीर में दशहरा समारोहों का मुख्य आकर्षण है।

तो, यह उत्सव क्या हैं? इसके पीछे के उत्साह और हल्ले का कारण क्या है? क्या आप पता लगाने के लिए तैयार हैं ???
आपको बस इतना करना है कि आराम करें और पढ़ना जारी रखें …

2. पूर्व:

दशहरा भारत के पूर्वी हिस्से में सबसे ज्यादा प्रतीक्षित त्यौहारों में से एक है। पश्चिम बंगाल, असम, छत्तीसगढ़, उड़ीसा के राज्य इस त्यौहार के लिए हफ्तों पहले से ही तैयारियों में जुट जाते हैं।

  • भुवनेश्वर: उड़ीसा की राजधानी भुवनेश्वर शहर प्रति वर्ष दशहरा का बड़े प्रेम से स्वागत करता है। भुवनेश्वर के अलावा, पुरी उड़ीसा का एक और शहर है जो अपने शानदार दशहरा समारोहों के लिए जाना जाता है। वातावरण में सुस्पष्ट उत्साह महसू किया जा सकता है जब लोग भारत के सबसे प्रतीक्षित त्यौहारों में से एक का स्वागत करने के लिए अपना सबसे अच्छा प्रभाव डालने का प्रयास करते हैं।

दशहरा के दिवस को और भी खास बनाने के लिए हर गाँव हर शहर को एक दुल्हन की तरह सजाया जाता है। लोगों को अपने दैनिक नित्यकर्म से अवकाश मिल जाता है क्योंकि वे आगामी उत्सवों के लिए उत्साहपूर्वक तैयार होते हैं। असम और पश्चिम बंगाल भी कहीं पीछे नई हैं!! उड़ीसा के समान यह राज्य भी दशहरा को उतने ही भव्यता और प्रेम से मानते हैं।

3. पश्चिम:
पश्चिमी भारत में दशहरा के उत्सव एक भव्य संबंध हैं। दशहरा मनाते समय महाराष्ट्र, राजस्थान और गुजरात सबसे आगे हैं।

  • महाराष्ट्र: महाराष्ट्र का घर-घर दशहरा के दौरान अपने ही धूम-धड़क्के में मग्न हो जाता है। मुंबई, पुणे, नासिक, नागपुर, औरंगाबाद और कई अन्य छोटे कस्बों एवं ग्रामों दशहरा का जश्न मनाने के लिए जम कर तैयारी करते हैं। लोग रेशम और जवाहरात पहन अपने घरों में पूजा करते हैं। वे अप्टा (बौहिनिया रेसमोसा) पेड़ के पत्ते एक दूसरे के उपहार के रूप में देते हैं। यह धन का आदान-प्रदान करने का एक प्रतीकात्मक संकेत है। महाराष्ट्र में इस पर्व के समय देवताओं के अलावा वाहन, औज़ार एवं पुस्तकों की विशिष्ट रूप से पूजा की जाती है।
  • गुजरात: गुजरात के दशहरा समारोह की जितनी प्रशंसा की जाय उतनी कम है। नवरात्रि, दशहरा से पहले आने वाला एक त्यौहार, 9 दिनों का एक असाधारण जश्न है जिसे गुजरात में सबसे ज़्यादा उत्साह के साथ मनाया जाता है। इसी 9 दिन के जश्न के बाद 10 वें दिन दशहरा आता है। गुजरात में नवरात्रि को अद्वितीय उत्साह के साथ मनाया जाता है। इसी हर्षोल्लास के वातावरण में चार चंद लग जाते हैं जब लोग दशहरा के पवित्र अवसर पर बुराई की जीत का सम्मान करने के लिए तैयार होते हैं।
  • राजस्थान: राजस्थान के लोग संभवतः सबसे शाही तरीके से दशहरा का स्वागत करने में कोई कसर नहीं छोड़ते हैं। जब बात राजसी थाट-बाट की हो, तो कोटा, राजस्थान का एक हलचल से भरा शहर रावण के लंबे और समृद्ध सजाए गए पुतलों के लिए जाना जाता है। यह पुतले दशहरा के दौरान बुराई को हराने के प्रतीक के रूप में जला दिये जाते हैं। जयपुर, उदयपुर, अजमेर कुछ अन्य कस्बे हैं जहां दशहरा का त्योहार उल्लेखनीय रूप से मनाया जाता है।

4. दक्षिण:
भारत के सांस्कृतिक रूप से समृद्ध दक्षिणी राज्य दशहरा के जश्न मनाने का अपना अलग ही अंदाज़ है! दक्षिण भारत में दशहरा समारोहों को मनाने के रीति-रिवाजों के बारे में जानने के लिए और पढ़ें:

  • मैसूर: मैसूर दक्षिण भारतीय राज्य कर्नाटक के सम्पन्न शहरों में से एक है। ऐसा माना जाता है कि मैसूर के दशहरा समारोह सबसे अद्वितीय और सुंदर अनुभवों में से एक है। भारत के बाकी हिस्सों के विपरीत जहां दशहरा समारोह एक दिन के लिए रहता है, मैसूर इस उत्सव को 10 दिनों की अच्छी, लंबी अवधि के लिए मनाता है। मैसूर दासरा, जैसा कि इस उत्सव को यहाँ पुकारा जाता है, किसी शाही जश्न से कम नहीं है। इस त्योहार का आनंद आपको उन्मुक्त कर आपको जीवन भर के लिए एक मीठी स्मृति दे जाएगा।

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केरल और तमिलनाडु भी दशहरा को खुशी से मनाते हैं। परंतु, स्थानीय संस्कृति और परंपराओं के अनुसार उत्सव मनाने के ढंग में विभिन्नता पायी जा सकती है।

दशहरा के दौरान देखने के लिए उत्सव:

  • रामलीला: रामलीला भगवान राम के हाथों दानव राजा रावण की हार का एक रोमांचक नाटकीय चित्रण है। यह उत्तर भारत के कई शहरों में दशहरा समारोहों का मुख्य आकर्षण है। लोग स्थानीय रंगमंच के सदस्यों द्वारा आयोजित इस नाटक को देखने के लिए बड़ी संख्या में इकट्ठे होते हैं।
    परंपरागत रूप से, केवल पुरुष रामलीला में कार्य करते हैं, जिसमें बड़ी सहजता के साथ वे महिला पात्रों का किरदार निभाते हैं।
    पौराणिक कथाओं का एक महत्वपूर्ण खंड देखना मंच पर लाइव खुलासा न केवल भारतीयों बल्कि विदेशियों के लिए एक दृश्य उपचार है।
    पौराणिक कथाओं को अपनी आँखों के समक्ष जीवित होते देखना सच में किसी जादू से कम नहीं। और यह जादू हर कोई, चाहे भारतीय हो या कोई विदेशी, अपनी आँखों से अनुभव कर पाता है।
  • रावण की प्रतिमा जलाना: ravan-dahan-image-dussehraरावण की पौराणिक हार अतीत के किसी युग में हुई थी। परंतु यह दशहरा के दौरान हर साल प्रतीकात्मक रूप से दर्शाई जाती है। इसी प्रतीकात्मकता को ध्यान में रखते हुए जगह-जगह पे रावण की प्रतिमा को जलाकर बुराई पर अच्छाई की जीत दर्शाई जाती है, जो अब एक परंपरा का रूप ले चुकी है।
    लकड़ी से बनाई गयी इवान रंगों से अलंकृत रावण की प्रतिमा को एक जलते हुए तीर को असपे छोड़ उसे जलाया जाता है। कुछ स्थानों पर कुंभकर्ण (रावण के राक्षस भाई) और मेघनाद (रावण के पुत्र) की प्रतिमाएं भी साथ में जला दी जाती हैं।
    लोग उसी जलते हुए प्रतिमा के टुकड़ों को इकट्ठा करते हैं। ऐसा मान्यता है कि यह बचे हुए अंश चोरी, दुर्भाग्य, दुर्घटनाओं और अन्य कई बुराइयों के खिलाफ उनकी रक्षा करने में सहायता करते हैं।
  • जंबू सवारी:
    मैसूर में इस त्योहार को परंपरागत रूप से मनाया जाता है जिसमें ‘जंबू सवारी’ कार्यक्रम का प्रमुख आकर्षण रहता है। जहाँ देवी माँ की सजाई सवारी बड़े धूम-धाम से निकाली जाती है।
    एक लघु मंडप का निर्माण करने के लिए कुल 750 किलोग्राम सोने का उपयोग किया जाता है!!! देवी चामुंडेश्वरी की सुरुचिपूर्ण तरीके से सजाई हुई मूर्ति इस भव्य जुलूस के लिए मंडप में राखी जाती है। हाथी की पीठ के ऊपर रखी गई मूर्ति के साथ एक रंगीन जुलूस अपने आकर्षक नृत्य और गायन की कला का प्रदर्शन करते हुए नज़र आती है। जुलूस शाही मैसूर महल से शुरू होता है और मैसूर शहर के कई स्थानों पर भ्रमण करता है। jamboo-sawari-dussehra
    प्रसिद्ध मैसूर पैलेस दशहरा के दौरान जगमगा उठता है, क्योंकि इसे 100,000 दीपों से सजाया जाता है !! इस उत्सव के विभिन्न संगीत समारोह, नृत्य प्रदर्शन, कई सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन मैसूर पैलेस में ही किया जाता है।
  • कुल्लू का दशहरा जुलूस: एक प्राचीन पौराणिक कथा के अनुसार, कई सदीयों पहले, भगवान रघुनाथ कुल्लू की घाटी में रहने वाले लोगों के प्रमुख देवता बन गए थे। उनके सम्मान में कुल्लू के लोग दशहरा के दौरान एक सुंदर जुलूस आयोजित करते हैं।
    भगवान रघुनाथ की मूर्ति को अन्य देवताओं की लघु मूर्तियों के साथ एक सुरुचिपूर्ण तरीके से सजाए गए रथ में ले जाया जाता है। जुलूस में हजारों श्रद्धालु गायन और सुन्दर संगीत की धुनों पर नृत्य करते हैं। लोग इन देवी देवताओं की पूजा आराधना कर उनसे आशीर्वाद मांगते हैं और नमन करते हैं।
    दशहरा का उत्सव लोक-नृत्य, सड़क पे छोटे-छोटे नाटक, लोक-संगीत जैसे कई सांस्कृतिक कार्यक्रमों के साथ जारी रहता है। रात में आयोजित कला केंद्र उत्सव हिमाचल प्रदेश के समृद्ध सांस्कृतिक इतिहास में अंतर्दृष्टि प्रदान करता है।
  • सिंदूर खेला:सिंदूर खेला विजयादशमी के दिन मनाई गई एक बहुत पुरातन बंगाली रीत है जहां महिलाएं सिंदूर (वर्मीमिलियन पाउडर) से एक-दूसरे को रंग देती हैं। यह पुरानी परंपरा एक अनुष्ठान का हिस्सा है जिसमें पानी में देवी की मूर्तियों को विसर्जित करने से पहले माँ दुर्गा का आशीर्वाद प्राप्त किया जाता है। असम, पश्चिम बंगाल, उड़ीसा कुछ भारतीय राज्य हैं जहां सिंदूर खेला का मनाते है।
    परंपरागत रूप से, केवल विवाहित महिलाएं सिंदूर खेल में भाग लेती हैं। ज्यादातर महिलाएं पारंपरिक सफेद और लाल बंगाली साड़ियों में तैयार होती हैं और खुद को आभूषणों से सजा देती हैं। महिलाएं देवी दुर्गा की मूर्ति की पूजा करती हैं, उसके ऊपर सिंदूर लगाती हैं और उसे मिठाई और पान के पत्ते एवं मिठाई की पेशकश करती हैं।
    भारी मात्रा में पकाया गया पारंपरिक भोजन बंगालियों के लिए दशहरा समारोह का एक प्रमुख आकर्षण है। खिचूड़ी, रसगुल्ला, पायेश, सोंदेश जैसे कुछ स्वादिष्ट व्यंजनों का जी भर के सेवन किया जाता है। बंगाली लोग दशहरा को अकेले नहीं, बल्कि बड़े दिल के साथ हर जाति, समुदाय और धर्म से लोगों के साथ मिलके मानते हैं। sindoor-khela-durga-puja-image-

कुछ क्षेत्रों के विशिष्ट इन परंपराओं के अलावा, कुछ प्रथाएँ हैं जिनका पालन दशहरा के दौरान लगभग प्रत्येक समुदाय करता है। इन रोमांचक रीति-रिवाजों के बारे में और जानने के लिए पढ़ें।

  • दशहरा के अवसर पर, जो वस्तु दैनिक जीवन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है, उसकी पूजा करना प्रथागत है। छात्र अपनी नोटबुक की पूजा करते हैं, काम करने वाले वयस्क अक्सर अपने कार्यालय डेस्क या कार्यक्षेत्र आदि की पूजा करते हैं। लोग अपने रसोई के बर्तनों की भी पूजा करते हैं। अक्सर, सत्यनारायण पूजा परिवार में सकारात्मक वातावरण का स्वागत करने के लिए दशहरा से एक संध्या पूर्व आयोजित की जाती है।
  • दशहरा के अवसर पर व्यावसायिक कार्यालय, कारखानों अथवा किसी भी प्रकार की कर्मभूमि में सुख समृद्धि का कामना करते हुए खास पूजा का आयोजन किया जाता है। त्यौहार को चिह्नित करने के लिए कर्मचारियों के बीच मिठाई और उपहार वितरित किए जाते हैं। कई कंपनियों के पास दशहरा के अवसर पर कर्मचारियों को कुछ बोनस तनख्वा देने की नीति है।
  • लोग एक दूसरे से मिलते हैं और मिठाई, उपहार, आशीर्वाद और शुबेच्छा का आदान-प्रदान करते हैं। आयु अंतर के बावजूद, हर कोई एक-दूसरे से आशीर्वाद लेता है। महाराष्ट्रियों में सोने के प्रतीक में अपटा पेड़ की पत्तियों का आदान-प्रदान किया जाता है।
  • चाहे आप अंग्रेजी में ‘हैप्पी दशहरा’ कहें, या मराठी में ‘दसरे च्या हार्दिक शुबेच्छा’, अथवा बंगाली में ‘शुभो बिजया’ से संबोधित करें, हर शुभकामना अपने आप में ही बहुत प्यारी लगती है। यद्यपि शब्द भिन्न हो सकते हैं, इस त्यौहार से जुड़ा उत्साह ही वह धागा है जो हर किसी को बांधे रखता है।
  • गेंदे के फूलों से खूबसूरत मालाएँ बनाई जाती हैं जिस्से लोग अपने घर, कार्यालय और यहां तक कि अपने वाहनों को सजाते हैं। लोगों के घरों के द्वार पर कलात्मक ढंग से व्यवस्थित फूल-पंखुड़ियाँ सभी उत्सवों की सुंदरता में चार चाँद लगा देती हैं।

तो आप इस साल दशहरा मना रहे हैं ??

जब तक आप अपने बैग पैक करते हैं, तब तक हमें अपनी यात्रा योजनाओं में आपकी सहायता करने दें। इस लेख का अगला भाग पर्यटकों के लिए कई यात्रा विकल्प प्रदान करता है।

यात्रा विकल्प

छुट्टियों की योजना बनाने का सबसे रोमांचक हिस्सा यात्रा योजना बना रहा है !! तो क्यों न इसे खास और आनंददायक बनाया जाय?? !! AdviceUncle के साथ यहां यात्रा विकल्पों की एक विस्तृत श्रृंखला खोजें।

  • हवाई यात्रा:भारत के अधिकांश मेट्रो शहर हवा के माध्यम से प्रमुख अंतरराष्ट्रीय स्थलों से अच्छी तरह से जुड़े हुए हैं। कई सरकारी और निजी एयरलाइंस अनेक भारतीय शहरों के लिए विभिन्न यात्रा मार्ग प्रदान करती हैं। यदि आपका हवाई मार्ग से आना-जाना लगा रेहता है, तो आप अपने ‘फ्लायर माईल्स’ का भी उपयोग कर सकते हैं और कई अच्छे ऑफ़र और छूट का लाभ उठा सकते हैं !!
    घरेलू हवाई यात्रा भी भारत में काफी आरामदायक है। कनेक्टिविटी अंतरराष्ट्रीय उड़ानों की तुलना में बेहतर है और कई उड़ान विकल्प उपलब्ध हैं। एयरपोर्ट अधिकारियों के पास एयरलाइन कर्मचारियों से संबंधित कई नियम हैं जो यात्रा को बहुत सुरक्षित बनाते हैं।
  • सड़क यात्रा:’रोड ट्रिप’… यह शब्द यात्रा प्रेमियों के लिए नोस्टालजिया की भावना पैदा कर देते हैं, खासतौर से उनमें जिन्होंने पहले कई बार अनुरोध कर मुफ़्त में यात्रा की है। जब आपका सफर सुंदर परिदृश्य से भरा हो तो यात्रा का मज़ा ही कुछ और है।भारत के भीतर सड़क से यात्रा करना दूसरे यात्रा विकल्पों से बहुत भिन्न है। सड़क से यात्रा करते समय आपको सबसे अधिक विस्मयकारी दृश्य देखने का मौका मिलता है।
    अगर आप सड़क से यात्रा स्वयं नहीं करना चाहते तो आप विकल्प के रूप में बस या कैब द्वारा भी जा सकते हैं। सरकारी और निजी ठेकेदारों द्वारा समान रूप से प्रदान की जाने वाली बस सेवाओं ने यात्रा मार्गों का एक विशाल नेटवर्क बनाया है। बस और कैब सेवाएं सबसे छोटे गांवों और प्रमुख मेट्रो शहरों को जोड़ती हैं।
    उबर और ओला जैसे निजी कैब सेवाएं छोटी दूरी या अंतर-शहर यात्रा के लिए उपलब्ध हैं।
  • रेल यात्रा:जो लोग भारतीय शहरों या गांवों में बड़े हुए हैं, उनके लिए रेल यात्रा एक ऐसी चीज़ है जो कई भावनाओं से जुड़ी हुई है। बचपन से ही लगभग हर भारतीय ने अपने पसंदीदा चचेरे भाई से मिलने या छुट्टियों के मौसम के दौरान अपने परिवार के साथ लंबी और रोमांचक रेल यात्राएं की हैं।भारत में रेल द्वारा यात्रा जैसा अनुभव हर पर्यटक को आज़माना चाहिए। भारत का रेल मंत्रालय विभिन्न कस्बों और गांवों को जोड़ने वाले रेल मार्गों के विशाल नेटवर्क को नियंत्रित करता है। रेल टिकट भारतीय रेलवे की वेबसाइट (www.irctc.co.in) या लाइसेंस प्राप्त ट्रैवल एजेंट के माध्यम से बुक किए जा सकते हैं।
    एक आरामदायक यात्रा आपके चित्त को प्रसन्न कर आपको आने वाली छुट्टियों के लिए तरोताज़ा कर देती है। खुशी से आएँ और उत्साह और खुशी के साथ दशहरा मनाएँ!!

पर्यटन स्थलों का भ्रमण विकल्प:

केरल के अनोखे चाय बागानों से कश्मीर में आश्चर्यजनक हिमाच्छादित पहाड़ों तक; असम में काज़ीरंगा राष्ट्रीय उद्यान के शाही हाथियों से महाराष्ट्र के पुरातन किलों तक, भारत में पर्यटकों के लिए देखनीय गंतव्यों की कोई कमी नहीं है।

जैसा कि आपने उपरोक्त पढ़ा है, दशहरा का त्यौहार भारत में लगभग हर जगह मनाया जाता है। और साथ ही आकर्षक पर्यटन स्थल भी हर कोने में पाए जाते हैं।
मैसूर, दशहरा उत्सव का केंद्रस्थल होते हुए सुंदरता और संस्कृति का प्रतीक है। यह पर्यटकों के लिए विभिन्न पर्यटन स्थलों का भ्रमण विकल्प प्रदान करता है। मैसूर में रहते हुए कूर्ग, ऊटी, वायनाड जैसे आसपास के पर्वत-स्थली का दौरा किया जा सकता है। यदि आप कुल्लू दशहरा को अनुभव करना चाहते हैं, तो शिमला और मनाली के गुलाबी सर्दियों का लुत्फ़ उठाना न भूलें।
इसी तरह भारत के हर कोने में कई अद्भुत स्थल हैं, जो पर्यटकों में प्रति दिन लोकप्रियता प्राप्त करते जा रहे हैं। जो सच में दिल से पर्यटक हो उसके लिए तो हर नयी जगह एक नए रोमांच का इशारा है!

दशहरा समारोह ‘बुराई पीआर अच्छाई की जीत’ का साकार रूप है!! अपने दिल में आशा के दीपक को प्रकाश दें, चिंताओं और तनाव को भूल जाएँ और इस उत्सव के मौसम में खुशी का जश्न मनाएं।

दशहरा का पर्व भारत में उत्सवों की रेल यात्रा की बस शुरुआत है। ‘रोशनी का उत्सव’ अर्थात दीवाली दशहरा के तुरंत बाद आता है जो लोगों के बीच पहले से ही आनंददायक और उत्सवपूर्ण मनोदशा को बढ़ाता है। तो सुनिश्चित रहिए कि भारत के विभिन्न हिस्सों की यात्रा के दौरान आप बस आनंद ही आनंद अनुभव करेंगे।

इस पोस्ट को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए कृपया यहाँ क्लिक करें|

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